Monday 19 October 2009

एक माँ की ज़ुबानी! अपनी बेटी की कहानी!!!





पता ही नहिं चला कि वक़्त कहाँ गुज़र गया?
लगता है कि तुम अभी भी हमारी गोदी में खेल रही हो ! मुझे याद है तुमने जब हमारे यहाँ आने की दस्तक दी थी। नर्स ने पहले तुम्हें तुम्हारे पापा की गोदी में दीया। पापा ने तुम्हारे कानों में अज़ान देकर अम्मी की गोदी में सोंप दिया। तुम्हारा चाँद सा चहेरा हमारी आनेवाली ख़ुशीयों का संदेश दे रहा था।
वक़्त गुज़रता चला तुम बडी होती चली। इधर हमदोनों अपनी अपनी नोकरी पर दिनभर व्यस्त रहते। शामको तुम्हारे साथ खेलते। कुछ ही वक़्त बाद हमारे यहां तुम्हारा भाई भी आ गया।
हमारी बगिया की दो कलियाँ अब फ़ुल बनने लगे। तुम दोनों भाईबहन अपनी पढाई के लिये दूर जाना हुआ। हम दोनों अब अकेले रह गये थे। तुम्हारे पापा सारा दिन ओफिस रहते। मैं अपनी ओफिस के बाद किताबों में लायब्रेरी में खोने लगी। तुम दोनों बिना वक़्त कैसे गुज़ारना यही हमारे लिये एक सवाल था।
फ़िर तुम्हारा दिल्ही के लिये सिलेक्शन हुआ। चार साल ?
ये हमारे लिये बडी ज़ुदाई का वक़्त था। पर तुमने अपना वक़्त और हमारी ईज़्ज़त दोनों को बराबर संभाल लिया।
हमारे बताये हुए रिश्ते को तुमने भी अपनी महोर लगा दी। हम कहते थे कि बेटी अगर तुम्हारी निग़ाह में कोई होतो कहो अपनी शादी के लिये
बस अब कुछ ही दिन बाक़ी थे। तुम अपना ग्रेज्युएशन ख़त्म करके लौट रही थी। और तुम्हारा भाई भी हमारे पास आ चुका था। हम बहोत खुश थे तुम्हारी कामयाबी से।
तुम्हें फ़ौरन एक अच्छी जोब भी मिल गई। डेढ साल कहां निकल गया पता ही नहिं रहा।मुज़े बडी ख़ुशी हो रही है ये कहते हुए कि मेरे साउदी अरेबिया जाने के दरम्यान तुमने बहोत ख़ूबी से अपना घर संभाल लिया था। मेरे आने के बाद फ़िर तुम्हारा मास्टर डीग्री के लिये सिलेक्शन हुआ। अब कुछ महिनों में तुम्हारी शादी थी । पर तुम्हारी केरियर का भी सवाल था। तुम्हारे ससुरालवाले भी ख़ुश हैं तुम्हारी पढाई से ।
तुम ईतनी सी उम्र में भी सब को साथ ले के चलनेवाली हो। शादी का फ़ैसला भी तुमने बहोत सोचकर ये कहकर लिया कि घर में नाना, दादा,दादी जैसे बुज़ुर्गों कि उमर हो चली है। नानी तो हमारी ख़ुशियाँ बिना अल्लाह को प्यारी हो गई है। आज मैं ये महसूस कर रही हूं कि मेरी अम्मी ने हमारी बिदाई पर क्या क्या सहा होगा?
पर ...हाँ उसकी दुआएं ज़रूर हमारे साथ हैं। देख़ो ! तुम्हारी शादी की तैयारी कितनी ज़ोरों से चल रही है। तूम तो अभी दिल्ही में ही हो।
अभी तो सारे महेमानो को न्योता भेजना बाक़ी है।
मेरे ब्लोगर साथीदारों को तो याद रख़ना ही है।
आ जाओ बेटी अब तुम्हारा ही इंतेज़ार है।


6 comments:

महफूज़ अली said...

Rona aa gaya padh kar..........

mehek said...

bahut hi marmik post.sunder

परमजीत बाली said...

मार्मिक पोस्ट।

M VERMA said...

क्या कहूँ!! नि:शब्द क्या कहेगा वह तो चुप रहेगा.

विनोद कुमार पांडेय said...

संवेदना से निहित सुंदर रचना..बढ़िया लगा..धन्यवाद

Vimla Bhandari said...

पढ़कर हम तो कायल हो गये
तुम्हारे दुखों में हम भी शामिल हो गये