Sunday 2 August 2009

कलम


है बड़ा उसमें जो दम।


चल पडे उसके कदम।


देखो क्या करती कलम।


कभी होती है नरम।


कभी होती है गरम।


देखो क्या करती कलम।


छोड देती है शरम।


खोल देती है भरम।


देखो क्या करती कलम।


कभी देती है ज़ख़म।


कभी देती है मरहम।


देखो क्या करती कलम।


कभी लाती है वहम।


कभी लाती है रहम।


देखो क्या करती कलम।


कभी बनती है नज़म।


कभी बनती है कसम।


देखो क्या करती कलम।


लिख्नना है उसका धरम।


चलना है उसका करम।


देखो क्या करती कलम।

3 comments:

M VERMA said...

कभी देती है ज़ख़म।
कभी देती है मरहम।
देखो क्या करती कलम।
=====
बहुत खूबसूरती से आपने कलम की ताकत का एहसास कराया.
बहुत अच्छा लगा

mehek said...

कभी देती है ज़ख़म।
कभी देती है मरहम।
देखो क्या करती कलम।
sahi kalam ki taqat aisi hi hoti hai,maram,garam si.sunderabhivyakiti badhai

ओम आर्य said...

bahut hi sahi hai ......ek kalam hi hai jo sabkuchh khol kar rakh deti hai.......isaki takat adabhoota hai