Sunday, 27 January, 2013

..फ़िर छिड़ी रात बात फूलों की.....






फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात हैं या बरात फूलों की

फुल के हार, फुल के गजरे
शाम फूलों की, रात फूलों की

आप का साथ, साथ फूलों का
आप की बात, बात फूलों की

फुल खिलते रहेंगे दुनियाँ में
रोज निकलेगी, बात फूलों की

नज़ारे मिलती है, जाम मिलते है
मिल रही है, हयात फूलों की

ये महकती हुयी गज़ल मखदूम
जैसे सेहरा में, रात फूलों की

Monday, 14 January, 2013

..उतरायन




14 जनवरी ‘उतरायन’ की सुब्ह में रंगबेरंगी पतंगों से भरे आकाश में चारों और से बच्चों की किलकारीओं के बीच, कहीं छत पर रख़े हुए स्पीकरों में बजते हुए शोर में, रंगबिरंगी टोपी,हेट और चहेरों पर गोगल्स की रंगीनीओं में उपर से नीचे की और अचानक नज़र जाते ही......
एक ख़ाट पर फ़टे हुए,कटे हुए पतंगों की उलझी हुई डोर को सुलझाकर अलग करते हुए तूं आवाज लगा रही है....लो बेटा ये ले लो...ये दोरी बहूत बडी है., इससे पतंग चढाओ।
 सर्दी की सर्द ऋत में पुराना स्वेटर पहनकर ,गुज़रे वक़्त की चुगली करते हुए झुरियों वाले हाथ की तरख़ी हुई उंगलियों में मांजा पीलाई हुई पतंग की डोर फ़ंस जाने से उस में से ख़ून की बूंद गीर रही थी,शायद तूझे पता नहिं था, या फ़िर जानबूझकर अनजान हो रही थी ऐसा मुझे लगा। तेरे सर पर बंधा सुफ़ेद स्कार्फ़ के ख़ुला हुआ उन में तेरे सुफ़ेद बाल मिलकर हवाके साथ उडते हैं तब ये पता ही नहिं लग पाता कि ये उन है या तेरे सुफ़ेद बाल , जो हमारी ज़िन्दगीओं के पीछे सुफ़ेद हो चले हैं।!!!
 “ वो कटी के शोर में , अचानक तंद्रा में से जागकर मैंने छत से नीचे नज़र की तो....तूं अद्रश्य थी.....
जी हाँ। याद आया, तूं तो कबसे चली गई हो अपनी जीवनडोर को समेतकर, बरसों से......उस कटी पतंग की तरहां दूर पतंगों के देश में....
मेरे देखे हुए इस द्रश्य को शायद किसी ने नहिं देखा होगा, क्योंकि सब कोई व्यस्त हैं ,अपने अपने जीवन के पतंग उडाने में....मैंने अपने रोते हुए दिल, आंख़ों को पोंछ लिया...और रंगीन गोगल्स चढा लिये अपनी आंख़ों पर...ताकि कोई मुझे देख न पाए रोते हुए.....पर मेरी नज़रे ढूंढती रहती हैं तुझे उसी ख़ाट पर जहाँ तूं बैठी थी डोर को हाथ में लिये..."माँ"

Friday, 7 December, 2012

गांधीकथा ..एक सच्चाई जो सिर्फ़ गांधीकथा में ही मिलेगी।




     लगातार 3 दिन  वडोदरा कि मध्यस्थ जेल में गांधीजी के खास दोस्त श्री महादेवजी देसाई के पुत्र श्री नारायण देसाई की ,'गांधी कथा" चल रही थी । गांधीजी जिन्हें बचपन में 'बाबला' कहकर बुलाते थे। आज जिनकी आयु 86 होने पर भी वो इतनी गहराई से 'गांधीकथा' सुनाते हैं कि सुननेवाला तल्लीन/मग्न होकर उन्हें सुनता है और अपने सामने स्वयं गांधी को ही जैसे पा लेता है। उनकी सादगी आंखों को भाती है। मैं देख रही थी कि 'गांधी कथा' सुननेवाला हर शख़्स उतना मशगुल हो जाता कि वक़्त का पता ही नहिं चलता...कि चार घंटे कैसे बित जाते थे!!!इनमें चाहे जेलर हो पूलीसकर्मी हो या फ़िर 'बंदिवान" हों।

   
 आज़ादी और बलिदानों के बारे में बहोत कुछ मिल जायेगा । पर श्री नारायणभाई देसाई  ने 'महात्मा' के जीवन के इतने बारिक बारिक पन्ने हम सब के सामने रख दिये, जो कभी ना किताबों में पढे थे ना सुने थे। बचपन से गांधीजी की गोद में खेले नारायण देसाई जी ने गांधी को 'मोहन' को "महात्मा" बनते देखा है। बात देश के विभाजन की हो या जलियांवाला बाग़ हत्याकांड  'बाबला'  ने गांधीजी को तूटते हुए देखा है। 'महादेव् देसाई' जिन्हों ने अहिंसक आंदोलन का पहला बलिदान दिया। पूना के पास आग़ाखान महल में 15 अगस्त 1942 को उनका निधन हो गया तब गांधीजी बहोत तूट गये थे। वे बारबार महादेव का कंधा हिलाकर कहते थे कि' उठो महादेव उठो, अपनी आंखें खोलो। उन्हें था कि एक बार महादेव उनसे नज़र मिला लेते तो यूं न चल् देते। गांधीजी ने अपने हाथों से 'महादेव देसाई' के निर्जीव शरीर को नहलाया और स्वयं अपने हाथों से अग्निसंस्कार किया। उस वक़्त भी अंग्रेतो  महादेव देसाई कि कस्तुरबा से बिछुडना और आग़ाखान महल जेल में 22 फरवरी 1944 कस्तुरबा की मृत्यु हुई। मरने से पहले कस्तुरबा ने गांधीजी से कहा था कि 'महादेव ' तो गया, अब मैं भी इसी जेल में मरनेवाली हुं। महादेव को गांधी-कस्तुरबा अपना बेटा ही मानते थे। मरने से पांच मिनिट पहले ही कस्तुरबा ने गांधीजी को पुकारा और उनकी गोद में ही अपने प्राण छोडे। 8 मई 1944 को 22 महिने आग़ाखान जेल में बिताने के बाद जब गांधीजी को रिहा किया गया तब सबसे पहले वे कस्तुरबा और महादेव की समाधि पर गये।नोआख़ली का सफ़ाई काम के माध्यम से हिंदु-मुस्लिम को जोडने के प्रयास के साक्षी हैं नारायण देसाई जी।जिसने ना कभी सत्ता का लालच किया ना संपत्ति का! उस बापू के संस्कारों का सिंचन बोल रहा था जैसे "गांधी कथा' के मंच से...
  अभी बहोत कुछ लिखना है, कहना है, जो हमने "गांधीकथा" में सुना। 'बापू की परछाई बने बापू के परममित्र, सखा,पुत्र,पी.ए कुछ भी कहदो ऐसे महादेव देसाई के 'पुत्र' नारायण देसाई  को......मैं अपने आप को नसीबदार कहुंगी कि मैंने उन्हें रुबरु सुना।
मेरे साथ साथ .'कारागार' का सारा वातावरण शुद्ध, सौम्य,शालिनता से सून रहा था इन महान कथाकार की वाणी को.....और मैंने एक रचना लिखदी.....






एक गांधी चल पड़ा है फ़िर उसी विश्वास में... 

जो पला पोषा हुआ है बापू के सहवास में.... एक गांधी.
जिसने जीवन मे उतारा बापू के आदर्श को,
दे रहा ‘गांधी कथा’ सारे य भारत वर्ष को.
गांधीका जीवन दिखाने की सुनहरी आसमें.....एक गांधी....
मान से सम्मान से और सत्य के आहवान से,
दे रहा शिक्षा हमें ‘गांधीकथा’के ज्ञान से,
ले चला भारत को एक अंधकार से वो प्रकाश में....एक गांधी...
बापू से सिखा है जिसने ज़िन्दगी के अर्थ को,
सादगी से जो जीया है, जिसने जाना फ़र्ज़ को,
वो जीया है आज देखो कर्म ले के श्वास में.....एक गांधी
 —

आज बहोत दिनों बाद इस मंच पर आने को प्रोत्साहित करने के लिये http://shabdswarrang.blogspot.in/के राजेन्द्र स्वर्णकार की आभारी हुं।

Saturday, 13 August, 2011

....पर वो नहिं थे जिनके चित्र बोलते थे वहाँ!!











स्विट होम की खोज:
वडोदरा मध्यस्थ जेल में एक सप्ताह के लिये सर्जन आर्ट गेलेरी वडोदरा द्वारा एक आर्ट शिबिर का आयोजन किया गया गुजरात जेलविभाग के सहयोग़ से। मेरा परिवार, मेरा प्यारा घर विषय देनेपर इन बंदिवान कलाकारों का काम उनके चित्रों में उनके विचार ,भावनात्मक संवाद के साथ स्पष्ट नज़र आया कि ये लोग अपने घर-परिवार ,अपने बच्चों को याद कर रहे हैं।श्री हितेश राणा,श्री आनंद गुडप्पा, श्री कमल राणा,श्री मूसाभाई कच्छी,जैसे होनहार चित्रकारों के साये में कलाकार्यशाला से ज़्यादातर प्रतिभागियों को एक मंच मिला जो उनकी प्रतिभाओं को बाहर ला सका। यह बात से प्रभावित सर्जन आर्ट गेलेरी वडोदरा के श्री हितेश राणा को एक और कार्यशाला के आयोजन के अपने विचार करने पर मजबूर होना पड़ा।

हालांकि यह एक्रेलिक रंग तथा कैनवास के साथ नया प्रयोग था पर सभी प्रतिभागियों ने बडी ही चतुराई से उनके चित्रण में भावनात्मक रुप लगाकर ,निष्ठा से निपटाया। उसका द्रष्टांत यह है कि 27 साल के कुंवारे बंदि जसवंत मेरवान महाला ,जिसने ना कभी कैनवास देखा था ,उसने गुजरात के ढोंगार के अपने पितृक गांव के खेतों का चित्र बना दिया।

एक और प्रतिभागी 31 साल के विनोद भगवानदास माळी ने अपने पुरानी यादों को दर्शाया जहां उन्होंने कुशलता से अपने आपको दादी की गोद में एक बच्चे के रुपमें मातापिता के साथ चित्रित किया। वो अपनी पुरानी यादों के खयाल को, उस प्यारे घर और परिवारजनों को याद करते हैं। उनका कहना है कि यह कलाकार्यशाला से उनके घावों को भरने में बहूत लाभांवित हुई है इसने उन्हें अपने कौशल को साबित करने का मौका दिया जो उनके माता पिता को गर्व कराने में सक्षम हैं। जब की बका उर्फ़े भूरा तडवी ने अपने व्यथित मन से एक माँ को अपने 6 वर्षिय स्कुल जाते हुए बच्चे को तैयार करते हुए दिखाया गया है । पृष्टभूमि पर फूलों की माला पहने लगाई हुई अपनी तस्वीर से वो यह दिखाना चाहता है कि अब वह अपने घर-परिवार के लिये अधिक कुछ नहिं है।

पादरा जिले के कुरल गांव के 29 साल के सिकंदर इब्राहिम घांची ने विरह चित्र में अपनी पत्नी जो गोदमें अपनी 6 माह की बच्ची को लेकर घर के आँगन में उनका इंतेज़ार कर रही है। और स्वयं को दिल के निशान से बनी सलाखों के पीछे आंसु बहाते दिखाया है। घांची कलाशिबिर में अपने आप को खूलेआम व्यक्त करते हुए बडी ही द्रढता से यह कहता है कि उसका यह चित्र पूरी दुनिया में दिखाया जाना चाहिये। वह विरह के इस चित्र से अपना दर्द दिखाकर इसका भाग बनने की वजह से खुश है।

40 वर्षिय मनोज पटेल जिन्हों ने इससे पहले सेना में सेवा की। जेल में आयोजित विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमो के वक्ता का रुप बडी ही निष्ठा से निभा रहे हैं।

अब वह अपनी संवेदनशील गुजराती कविताओं की रचना भी करते रहते हैं। उन्हों ने अपने चित्र में जेलों में रक्षाबंधनका महत्व को दर्शाया है। मनोज एक सच्चे,प्रेरणास्रोत हैं और सभी प्रतिभागियों के लिये उपयोगी हैं। उन्हों ने पश्चिम बंगाल के राजेश निमायचंद्र मित्ते के साथ बी.ए.का अध्ययन किया है।

42 साल की आयु के राजेश निमायचंद्र मित्ते , जो कभी स्टेनोटाइपीस्ट और बढ़ई का काम करते थे आज चित्रकार भी बन गये हैं। वह ये कलाकार्यशाला के संरक्षक रहे हैं। वह कहते हैं चित्रकला ने उन्हें पुन:जन्म दिया है। इससे उन्हें बहूत ख़ुशी और संतुष्टि मिली है। वे ये भी कहते हैं कि मैं अपने जीवन की कल्पना, कला के बिना कर ही नहिं सकता। उन्हों ने महिला की विभिन्न भूमिकाओं को उनकी मुसीबतों को ,अपने परिवार के प्रतिरोध के साथ दर्शाया है कहते हैं जेलकी तुलना में अपना संघर्ष ज़्यादा है।

ओरिस्सा के कनैया लींगराज प्रधान ,छोटी ही उम्र में पहली बार जेल में आये हैं। अपने तीन भाईयों के साथ गुजरात के सुरत में काम करते थे। जीन्होंने धान के खेत में अपनी पीठ पर बच्चा लिये काम करती महिला की तस्वीर को दर्शाकर उन कृषि मज़दूरों कि व्यथा को याद किया है जो अपने परिवार के जीवन के दो छेडे जोडने के लिये काफ़ी महेनत करते रहते हैं।

गुजरात संजाण के 27 साल के सतीष सोलंकी जिन्होंने अपने जेल रहते हुए ही अपने पिता को खो दिया । रक्षाबंधन की स्मृति में उनकी बहन उन्हें राखी बांधते हुए और दादीमाँ को ये द्रश्य निहारते हुए दिखाया है।

जितेन्द्रकुमार मेवालाल त्यागी ,सूरत के 26 साल के साइनबोर्ड के यह कलाकार मूलत: उत्तरप्रदेश के हैं,जिन्हों ने महिला और बच्चे के चित्र के साथ अपने वयोवृध्ध मातापिता को दिखाया है जो उसके रिहाई का इंतेज़ार कर रहे हैं।

सतीष सोलंकी और जितेन्द्र त्यागी के लिये तो चित्रकला शिबिर भविष्य के लिये एक ताज़गीसभर मंच है।

28 वर्षिय अशोककुमार भोजराजसींह, जिनका पुत्र जो पाठशाला जाना चाहता है पर अपनी आर्थिक परिस्थिती के चलते ये शक्य नहिं हो रहा । अपने चित्र के माध्यम से पाठशाला जाते हुए युनिफोर्म पहने बच्चों के समूह की और अपनी दादी का ध्यान दिलाने के लिये इशारा करते हुए अपने बेटे को दिखाया है।

दिलीपभाई मोतीभाई ,पूर्व सरकारी कर्मचारी बारह से अधिक वर्ष से जो जेल में हैं।

अपने पीछले जीवन के शांतिपूर्ण घर-परिवार को याद कर रहे हैं। परिवार के कमानेवाले एकमात्र सदस्य होने के नाते अपनी अनुपस्थिति में घर की आर्थिक परिस्थिति दर्शाने का प्रयास किया है अपने चित्रकला के माध्यम से किया है।

अर्जुन सिंह राठोड , वडोदरा के ही वतनी जो आयकर विभाग में डेप्युटी के पद पर थे, उन्हें अपने घर की बहोत याद आ रही है ये अपनी दिलचस्प कला से दिखाया है। जिसमें अपने दो बच्चों को पकडे हुए एक माँ को चित्रित किया है। उन्हों ने अपनी भावनाओं को केनवास पर दर्शाते हुए आयोजकों की सराहना की है।


जिग्नेश कनुभाई कहार, 30 साल के नवसारी के, यह मछुआरे का धंधा करके सुखी जीवन बितानेवाले यह बंदी अब बस छुटने ही वाले हैं। चित्र द्वारा उनके छुटने का इंतेज़ार करते हुए उसकी माँ को चित्रित किया है।

नीतीन भाई पटेल आयु 47 के कालवडा,वलसाड जिले के रहीश ने खूबसुरत नारियेल के पेडों से घीरे घर में अपने परिवार के सदस्यों में अपने पिताजी, छोटाभाई ,जीजाजी और अपने भतीजे को दर्शाया है ,अपनी पत्नी को अपनी रिहाई की मंदिर में प्रार्थना करते हुए दिखाया है।

अनवर अली मलेक आयु 38 जंबुसर का रिहायशी कढाई का कारिगर ,कुदरत के चित्र के साथ अपने घर के चित्र में जानवर पक्षी और पानी भरकर आती महिलाओं के साथ ,आँगन में बेठी बच्ची को खिलौनों के साथ दिखाया है। इस कलाकार ने बडी ही निपुणता से बीजली के खंभे के पास खडे व्यक्तिको अपनी बच्ची का हाथ पकडे द्रष्टिमान करते हुए परिवार की 11 साल लंबी जुदाई को दिखाया है। जीसे चित्रकला खुश रखती है।

अर्जुन रामचंद्रभाई पार्टे ,40 साल के सयाजीगंज वडोदरा के ही इस कलाकार ने रक्षाबंधन की पूर्व संध्या पर हाथ में राखी पकडे अपने बेटों का घर पर इंतेज़ार दिखाया है। कैनवास पर ये उसका पहला प्रयास है।

प्रशांत राजाराम बोकडे ,27 साल के महाराष्ट् के सुनार को जेल में आये 9 साल हो गये । उसने जीसे अभी तक देखा भी नहिं है ,उस भतीजी को जन्मदिन विश किया है और उसे सपना नाम भी दे रख्खा है। सपना वो कहते हैं उन्हें उसका जन्मदिन भी याद नहिं पर उसका जन्मदिन हररोज़ मनाते हैं। उसकी बहोत याद आती है।

अंत में महेश सोलंकी आयु 28 वर्ष कामदार ने एक पुरानी हवेली जो जेल सी दिखाई देती है दिखाया है। अपनी केरीयर के खो जाने दुखद परिस्थिती से आहत इस कलाकार की माँ भी इसी जेल में है।


अंत में जब ये प्रदर्शिनी को जनता के सामने 10 अगस्त को 'सर्जन आर्ट गेलेरी ' में ही रख्खा गया तब वो दिन इस टीम और मेरे लिये बहोत बड़ा दिन था। प्रशांत राजाराम बोकडे के चित्र से प्रदर्शीनी को जनता के लिये खोला गया। मेरी एक गुजराती रचना भी इस केटलोग पर रख्खी हुई थी। मुझे इस के बारे में जब बोलने को कहा गया तब मैंने सभी प्रदर्शनी में आये लोगों से कहा कि आप चित्र तो बना लेंगे पर आप इनकी तरहाँ संवेदनाएं नहिं भर सकते।

यहाँ बंदिवानों के रिश्तेदारों को भी बूलाया गया था। पर जिन्हों ने अपने विचारों को चित्रों में उतारा था वो बंदिवानों की ग़ेरमौजुदगी बहोत खल रही थी। कायदे के हिसाब से ये भी ज़रूरी था। जब मैं जेल में उन बंदिवानो से मिली वो बडे उतावले हो रहे थे ये जानने के लिये कि प्रदर्शनी में क्या क्या हुआ। पर मैंने रो दिया। कुछ कह नहिं पाई। एक केटलोग से उन्हें सब कुछ बता दिया। उन्होंने भी रो दिया।

केदी सुधारणा कार्यक्रम के अंतर्गत गुजरात जेल के आई जी श्री पी.सी.ठाकुर का प्रयास बेहद सराहनीय है। जो ऐसी प्रतिभाओं को किसी न किसी माध्यम से जनता समक्ष लानेका प्रयास करते रहते हैं।


Wednesday, 4 May, 2011

..चलो आख़िर मारा तो गया ओसामा





10 मार्च 1957 को रियाध सउदी अरब में एक धनी परिवार में जन्मे ओसामा बिन लादेन

अल कायदा नामक आतंकी संगठन का प्रमुख था।

जो संगठन 9 सितंबर 2001 को अमरीका के न्यूयार्क शहर के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के साथ विश्व के कई देशों में आतंक फैलाने का दोषी था। उस अलक़ाएदा संगठन के मुखिया ओसामा बिन

लादिन को पाकिस्तान के एबटाबाद में रविवार रात CIA ने मार गिराया गया। मध्य पूर्वी मामलों के विश्लेषक हाज़िर तैमूरियन के अनुसार ओसामा बिन लादेन को ट्रेनिंग CIA ने ही दी थी।

वो जहाँ रहता था वो एक ऐसी इमारत थी जीसकी दीवार 12 से 18 फ़ीट की थी, जो इस इलाक़े में बनने वाली इमारतों से कई गुना ज़्यादा थी।. इस इमारत में न कोई टेलिफ़ोन कनेक्शन था और न ही इंन्टरनेट कनेकशन। यहीं छिपकर बैठा था दुनिया को अपने आतंक से हिलाकर रख देने वाला आतंकी। जिसने कंई बेगुनाहों को कत्ल कर दिया। क्या उसका यही मज़हब था????

सऊदी अरब में एक यमन परिवार में पैदा हुए ओसामा बिन लादेन ने अफगानिस्तान पर सोवियत हमले के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए 1979 में सऊदी अरब छोड़ दिया. अफगानी जेहाद को जहाँ एक ओर अमरीकी डॉलरों की ताक़त हासिल थी तो दूसरी ओर सऊदी अरब और पाकिस्तान की सरकारों का समर्थन भी था।.

सबसे आश्चर्च की बात गुफाओं में रहने-छिपनेवाला लादेन अमेरिका को एक पॉश कॉलोनी में मिला!!!!!

वह भी पाकिस्तानी मिलिट्री अकादमी से सिर्फ 800 मीटर की दूरी पर!!!!

जहाँ परदेशी एक परिन्दा भी अपनी उडान नहिं भर सकता उसी ज़मीन पर एक ख़ोफ़नाक आतंकी दुनिया की नज़र से छिपकर कैसे रह सकता था भला?

या पाकिस्तान की नज़रे इनायत तो नहिं थी उस पर!!!!!

चलो ख़ेर आख़िर मारा तो गया जो इस्लाम के/इंसानियत नाम पर एक धब्बा था ।

नादान जवानों को मज़हब के नाम पर या जिहाद के नाम पर जान की बाज़ी लगाने भेजकर खुद एशो-आराम की ज़िन्दगी बसर करता था।

या कहो कि इस्लाम से /इंसानियत से ख़िलवाड कर रहा था।

जो अपने वतन (साउदी अरब) को वफ़ादार नहिं था वो भला अपने मज़हब को वफ़ादार कैसे हो सकता था?

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Thursday, 20 January, 2011

.....कहीं हमारे पंखों को...?

पतंग

आज एक दिन के लिये ये आसमाँ पर तुम अपना हक़ जताने चले हो अपने रंग-बिरगी पंखों से सभी को ललचाने लगते हो?

… पर ये मत भूलो तुम्हें एक डोर पकडे हुए है।

तुम डोर के सहारे आसमाँ की उंचाई नापने कि कोशिश करते हो?

तुम तो एक कठपूतली के समान हो जैसे किसी हाथ से डोर तूटी तुम भी कट जाते हो।

….और फ़िर किसी ओर के हाथों में चले जाते हो।

तुम में जान थोडी है? जो ईतना इतराते हो आसमाँ पर …!!!

एक दिन के सुलतान बने बैठे हो ।तुम हो क्या ?

तुम तो एक कागज़ के बने निर्जीव हो!!!

तुम ये मत भूलो कि हम तो एक ज़िन्दा जीव हैं।

सुबह होते ही अपने घोसलों से कहीं दूर..दूर अपने लिये तो कभी अपने बच्चों के लिये दाना चुगने जाते हैं।

शाम होते ही अपने घर लौट आते हैं फ़िर यही अपने पंखों पर..

उडना ही हमारा क्रम है।

देखना कहीं हमारे पंखों को काट मत देना वरना हम आस्माँ को फ़िर कभी छू नहिं पायेंगे।

Monday, 22 November, 2010

.......“लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैक .....




हज


एक ऐसी अजीमुश्शान इबादत और फ़रीज़ा जिसके हर अमल से इश्क और मोहब्बत और कुरबानी का इज़हार होता है एक मुसलमान के लिए अपने रब से मोहब्बत का इज़हार करते हुए दुनिया की हर चीज़ को छोडकर सिर्फा और सिर्फ दो बीना सीले हुए कपड़ो में यानी कफ़न पहने सच्चे आशिक बनाकर तमाम तकलीफों और मुसीबतों को खुशी के साथ बर्दाश्त करते हुए अल्लाह की खुशनूदी और रज़ा लेकर उसके दरबार में हाज़िर होता है उस पाक दरबार में अपने आपको अल्लाह की इबादत में समेट लेता है हज़ा को आना एक फ़रीज़ा तो है ही हर मुसलमान इस पाक जगह पर पहोचने के लिए अपनी ज़िन्दगी की कमाई को इकठ्ठा करता है दुनिया की साड़ी जिम्मेदारियों से फारिग होकर अपने को अल्लाह के सुपुर्द करता है जो न किसी कर्जदार रहता है हाजी जब अपने को अहेराम में समेट लेता है उस पर तभी से सारी पाबंदीया शुरू हो जाती हैं और हाजी अल्लाह से इन पाबंदीयों को निभाने का वादा करता है जैसे की …॥
१) अहेराम की हालात में किसी जीव-जंतु को मारना नहीं
२) शिकार करना नहीं है
३) हरी घास या पेड़ काटने नहीं हैं
४)खुशबु लगाना नहीं है
५) नाखुन काटना नहीं है
६) शारीरीक सम्बन्ध बनाना नहीं है
“लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैक ला शरीका लाका लब्बैक इन्नल हमदा व नेअमता लाका वाला मुल्क ला शरीक लाका
( हाज़िर हु अय अल्लाह आपका कोई शरीक नहीं मैं हाज़िर हु सारी तारीफें और सब नेअमते आपही के लिए हैं और सारी दुनिया पर हुकुमत आपकी ही है हुकुमत में आपका कोई शरीक नहीं
”दिया हुआ तो उसी का है मगर हक तो यहाँ है की हक अदा हो जाये”
”तूं नवाबा है तो तेरा करमा है वरना,
तेरी ताअतों का बदला मेरी बंदगी नहीं’
मैं अपने आप को बहोत ही नसीबदार मानती हूँ की अल्लाह ने मुझ पर अपने करम की इनायत अता की

Sunday, 4 July, 2010

इंडिया क्लब में एंडरसन

" जनोक्ति विशेष " में इस सप्ताह पढ़िये आशुतोष जी का लेख " इंडिया क्लब में एंडरसन ! भोपाल के २५ हजार लोगों की मौत का जिम्मेदार एंडरसन किस तरह भारतीय राजनीति और न्यायपालिका में बैठे हमारे प्रतिनिधियों  द्वारा बचाया गया ? किस तरह एंडरसन ने किस -किस को उनकी स्वामिभक्ति के लिए पुरूस्कार स्वरुप क्या-क्या दिया ? कौन -कौन से नेता और वकील भारतीय जनता के गुनाहगार हैं ? इन प्रश्नों का जबाव आपको इस आलेख में मिल जायेगा और कुछ ऐसे चेहरे भी बेनकाब होंगे जो आज खुद को पाक साफ़ बता रहे हैं !  

Monday, 28 June, 2010

.....तुम्हे आना पडेगा , मेरी आवाज सुनकर

Monday 28 September 2009

.....अभी न जाओ छोडकर.....





.....अभी तक तो अपनी पोस्ट लिखती रही।
.....
पर आज एक ऐसी पोस्ट लिखने जा रही हुं जो अनदेखा होते हुए भी हमारा,
और....
हम सब का है।
वो है
"ब्लोवाणी'
कल ही सुब्हा, जब असत्य पर सत्य के त्यौहार"विजयादशमी" की बधाई देने जैसे ही ब्लोगर का पन्ना खोला...
.....एक दर्दभरा समाचार सुननेको मिला।
"दशहरे के मौके पर
ब्लोगवाणी बंद'
ये पढना हमारे लिये काफ़ी कठीन रहा।
मानो जैसे
एक मिठाई में नमकीन का आ जाना।
वैसे ही हमें दशहराके त्यौहार के बीच ये लगने लगा था।
कुछ मज़ा नहिं आ रहा था कल ।
लग रहा था कि कोई अपना हमें छोडकर चला गया।

पर आज...जब ये पढा कि 'ब्लोगवाणी वापस आ गया है" , मन प्रफ़ुल्लित हो उठा।
ऐसा लगा जैसे " कोई अपनों से रुठा ,....अपना, फ़िर से वापस आ गया"

बडे आनंद का अनुभव कर रही हुं आज।
आज की मेरी ये पोस्ट " खासकर ब्लोवाणी को समर्पित है"।




Monday 28 September २००९ को अभी न जाओ छोडकर के टाईटल से लिखी मेरी यह रचना को अब
ओक्सिजन की ज़रुरत आन पडी है। ब्लोगवाणी क्या रुक सकती है? ये तो हमारी साँस है।
उम्मीद है ज़रुर वापस आयेगी।





Sunday, 27 June, 2010

“हम साथ साथ हैं…..




too


बढते दाम ज़िन्दगी की रफ़तार को रोक लेंगे क्या?

आजकल महंगाई से तो मानो जान पर आ बनी है।

हर तरफ महंगाई का चर्चा है। मध्यम और ग़रीबों का तो कोई बेली ही नहिं रहा। जब जब महगाई का चर्चा होने लगता है तब तब और किसी न किसी

तरहाँ राजनीति खेली जाती है। पक्षा-पक्षी में

मरता तो सिर्फ़ ग़रीब ही है।

कहीं वोट के नाम पर विरोध हो रहा है कहीं नोट के नाम पर|

आज की ही बात ले लिजीये। एक जगह भीड इकट्ठा की गई थी महंगाई के ख़िलाफ़ पर उस भीड को पत्रकारों ने सवाल पूंछा आप यहाँ क्यों ईकटठा हुए हैं

तो भीड ने जवाब दिया हमारे मकान तोडे जा रहे हैं इसलिये हम आये हैं।

अब बताईये ये अनजान लोगों कि भावनाओं से खेलकर क्या मिलता है “वोट”!!!

रोज़रोज़ मज़दूरी करके अपना पेट भरनेवालों का ना तो किसी पक्ष से वास्ता है ना कि पार्टी से..

जो भी हो हम तो मोटी चमडीवाले जो ठहरे भैया ।

चलने दो थोडा और तभी तो हमारा वजुद रहेगा।

भला हमें क्या महंगाई से लेना देना? हमें तो पता भी नहिं महंगाई कौनसी बला का नाम है?

हमारे बच्चे तो कोंन्वेंट स्कुलों में पढते हैं। अच्छी से अच्छी फ़्लाईट को जी चाहे तब मोड सकते हैं।

पार्टीयाँ तो हररोज़ होती रहती हैं। हमें महंगाई के सोल्युशन से क्या?

हम तो तब ही इकट्ठा होते हैं जब संसद में हमारा भथ्था बढाना होता है ।

हमें आम जनता से क्या लेना देना? चाहे जीये या मरे।

जब इलेक्शन आयेगा तब देखा जायेगा। हमें कोई न कोई मुदा तो मिल ही जायेगा।

कुछ मस्ज़ीद की इंटें गिरा देंगे या मंदिर पर हमला करवा देंगे।

फ़िर भारत बंध का एलान देकर इन्ही गरीबों का मुंह का निवाला छीन लेंगे।

भथ्था बढाने के लिये तो ….

“हम साथ साथ हैं…..

Tuesday, 15 June, 2010

आपकी छ्त्र छाया

धक..धक..धक..धक… मौत का काउनडाउन शुरु हो चुका था।
मेरे “बाबा”(पिताजी) हम सब को छोडकर दुनिया को अलविदा कहने चले थे।
अभी सुबह ही तो मैं आईथी आपको छोडकर “बाबा”
मैं वापस आने ही वाली थी। और जीजाजी का फोन सुनकर आपके पास आ भी गई। आपके सीनेपर मशीनें लगी हुईं थीं।
आप को ओकसीजन की ज़रुरत थी शायद ईसीलिये। फ़िर भी आप इतने होश में थे कि हम तीनों बहनों और भाइ को पहचान रहे थे। आई.सी.यु में किसी को जाने कि ईजाज़त नहिं थी ।
….पर “बाबा” हमारा दिल रो रहा था कि अभी एक ही साल पहले तो मेरी “अम्मी” हमें छोडकर जहाँ से चली गई थीं । आप हम सब होने के बावज़ुद तन्हा ही थे।
हम सब मिलकर आपको सारी खुशियों में शरीक करते .....
पर “बाबा” आप !!हर तरफ मेरी “अम्मी” को ही ढूंढते रहते थे। आपको ये जहाँ से कोई लेना देना ही नहिं था मेरी “अम्मी” के जाने के बाद।
क्या “बाबा” ये रिश्ता इतना ग़हरा हो जाता है?
मुझे याद है आप दोनों ने हम तीनों बहनों को समाज और दुनिया कि परवा किये बिना ईतना पढाया लिखाया । लोग हम बेटीयों को पढाने पर ताने देते रहते थे आप दोनों को।
पर आप और अम्मी डटे रहे अपने मज़बूत ईरादों पर। यहाँ तक की आप ने हमारी जहाँ जहाँ नौकरी लगी साथ दिया। आपको तो था कि हमारी बेटीयाँ अपना मकाम बनायें।
और “बाबा” आप दोनों कि महेनत रंग लाई। हम तीनों बहनों और भाई सरकारी नौकरी मे अव्वल दर्जे के मकाम पर आ गये। शादीयाँ भी अच्छे ख़ानदान में हो गईं।
समाज को आपका ये ज़ोरदार जवाब था। आप दोनों महेंदी कि तरहाँ अपने आपको घीसते रहे और हम पर अपना रंग बिखरते रहे । अरे आप दोनों दिये कि तरहाँ जलते रहे |
और …हमारी ज़िन्दगीयों में उजाला भरते रहे। आप की ज़बान पर एक नाम बार बार आता रहा “मुन्ना” ! हम तीनों बहनों का सब से छोटा भाई।!बाबा” हमारे छोटे भाई”मुन्ना” ने भी आप को
बचाने के लिये बहोत कोशिश की है।
“बाबा” हमें थोडी सी ठोकर लगती आप हमें संभाल लेते। आप पर लगी ये मशीनरी मेरी साँसों को जकड रही थी। और आप हमारा हाथ मज़बूती से पकडे हुए थे कि
हम एकदूसरे से बिछ्ड न जायें। मौत आपको अपनी आग़ोश में लेना चाहती थी। हम आपको ख़ोना नहिं चाहते थे। “बाबा” आपकी उंगलीयों को पकड्कर अपना बचपन
याद कर रही थी मैं। वही उंगलीयों को थामे हम आज इस राह पर ख़डे हैं। आप दोनों ने हमारे लिये बडी तकलीफ़ें झेली हैं। आप हमें अपनी छोटी सी तंन्ख़्वाह में भी
महंगी किताबें लाया करते थे।
आपकी भीगी आँखों में आज आंसु झलक रहे थे। बारबार हम आपकी आँखों को पोंछ्ते रहे। नर्स हमें बार बार कहती रही कि बाहर रहो डोकटर साहब आनेवाले हैं।
मुझे गुस्सा आ रहा था कि आपको डीस्चार्ज लेकर घर ले जाउं कम से कम आपको तन्हाई तो नहिं महसूस होगी। हम दो राहे पर थे या तो आपकी जान बचायें या फ़िर आपके पास रहें।
धक..धक..धक.. में आप खामोश हो गये थोडी देर आँखें खोलकर बंद कर लीं आपने। हमें लगा आप सो रहे हैं ।
पर…. डोकटर ने आकर कहा ” He is expired”
आप हमें छोडकर आख़िर “अम्मी” के पास पहोंच ही गये। “बाबा” आपकी तस्वीर जो पीछ्ले साल ली गई थी मेरे पास है आप “अम्मी” की क़ब्र पर तन्हा बैठे हैं|
baabaa
आज आपको भी बिल्कुल “अम्मी” के पास ही दफन कर आये हैं हम। आपकी यादें हैं हमारे लिये “बाबा” यह लिखते हुए मेरी आँख़ों के आगे आँसुओं कि चिलमन आ जा रही है।
छीप छीपकर पोंछ रही हुं ताकि कोई मुझे रोता हुआ देख न ले। ये कैसी विडंबना है “बाबा”!!!!
आज की यह पोस्ट मेरे प्यारे “बाबा” को समर्पित है।

Saturday, 1 May, 2010

50 वीं सालगिरह मुबारक हो....








गुजरात
और महाराष्ट्र को अपनी
50 वीं सालगिरह मुबारक हो।

सदा खुशहाल रहो।


सदा फलो और फ़ुलो।


बूराई का साया तुमसे हंमेशाँ दूर रहे।

Sunday, 25 April, 2010

आई = माता














हाँ !

में "माँ" हुं।

कभी मैं भी जवान थी।

पर आज 63 कि उम्र में अब 100 से भी ज़्यादा लग रही हुं।

कारन?

....... मेरे कुछ बेवफ़ा/ गद्दार "संतानों"कि वजह से।

जिन्हों ने मुझे कमज़ोर कर दिया है।

आज में आपको अपनी तस्वीर बतानेवाली हुं एक आत्मकथा के रुप में।

पर अब सिर्फ़ कहलाने को रह गई हुं। मेरी ही संतान मुझे खोखला करने पर तुली हुई है।

दुनिया के सामने तो मेरा नाम बडे ही गर्व से लेती है मेरी संतान के कि ये हमारी "माँ "है।

पर अंदर ही अंदर मेरे बच्चे आपस में लड़ते-झगडते रहते हैं।

वो भी क्या ज़माना था कि मेरे लिये जान देने को मेरी संतान तैयार थी।

पर आज ...... ये संतान मेरी जान के पीछे पडी हुई है।

अपने स्वार्थ की ख़ातिर इन लोगों ने मुझे बदनाम कर रख्खा है।

कभी पैसों कि खातिर तो कभी ज़मीन की ख़ातिर।

कहती रहती हुं कि भाई !!

अरे आपस में मिलकर रहो

"अगर तुम सब यूं ही लडते-झगडते रहोगे तो पडोसी तो खुश होंगे ही"

कहेंगे "अपने आप पर ये "माँ" को बडा गुरुर था जाने दो ये सब बाहरी दिखावा है भीतर क्या है खुलकर सामनेआता है"

बताओ तब मेरा ख़ून खौलेगा या नहिं???????

क्यों मेरी आत्मा के साथ "आई पी एल" ख़ेले जा रहेहो "भ्रष्टाचार "के रुप में?

क्या इसलिये कि मैं...........भारतमाता........हुं?

Wednesday, 21 April, 2010

श्रध्धांजली"











बस बिल्कुल इसी समय आप हमें छोडकर चली गईं थीं। वक़्त भी यही था। दिन भी यही। अपनी सारी ज़िंदगी हमारे लिये न्यौछावर करदी। अपने लिये तो सोच लेती मेरी "माँ"!!!! हम तीनों बहनों को और भाई को समाज और ज़िंदगी में एक ऐसा मुकाम दिलाया। हमेशाँ बच्चों कि ही फ़िक्र में लगी रहती थी तुम। आज किसी शायर की पंक्तिओं के साथ आपको मेरे श्रध्धासुमन।
बस बिल्कुल इसी समय आप हमें छोडकर चली गईं थीं। वक़्त भी यही था। दिन भी यही। अपनी सारी ज़िंदगी हमारे लिये न्यौछावर करदी।
अपने लिये तो सोच लेती मेरी "माँ"!!!!
हम तीनों बहनों को और भाई को समाज और ज़िंदगी में एक ऐसा मुकाम दिलाया। हमेशाँ बच्चों कि ही फ़िक्र में लगी रहती थी तुम। आज किसी शायर की पंक्तिओं के साथ आपको मेरे श्रध्धासुमन।

मौत के आगोश में जब थक के सो जाती है माँ
तब कहीं जा कर सुकून थोडा सा पा जाती है माँ

फ़िक्र में बच्चों की कुछ इस तरह घुल जाती है माँ
नौजवान होते हुए बुज़ुर्ग नज़र आती है माँ

रूह के रिश्ते की ये गहराईयां तो देखिये
चोट लगती है हमें और चिल्लाती है माँ

कब ज़रुरत हो मेरे बच्चों को इतना सोच कर
जागती रहती हैं आखें और सो जाती है माँ

हुदीयों का रस पिला कर अपने दिल के चैन को
कितनी ही रातों में खाली पेट सो जाती है माँ

जाने कितनी बर्फ़ सी रातों मे ऎसा भी हुआ
बच्चा तो छाती पे है गीले में सो जाति है माँ

जब खिलौने को मचलता है कोई गुरबत का फूल
आंसूओं के साज़ पर बच्चे को बहलाती है माँ

फ़िक्र के शमशान में आखिर चिताओं की तरह
जैसी सूखी लकडीयां, इस तरह जल जाती है माँ

अपने आंचल से गुलाबी आंसुओं को पोंछ कर
देर तक गुरबत पे अपने अश्क बरसाती है माँ

सामने बच्चों के खुश रहती है हर इक हाल में
रात को छुप छुप के लेकिन अश्क बरसाती है माँ

पहले बच्चों को खिलाती है सकूं--चैन से
बाद मे जो कुछ बचा हो शौक से खाती है माँ

मांगती ही कुछ नहीं अपने लिए अल्लाह से
अपने बच्चों के लिए दामन फ़ैलाती है माँ

अगर जवान बेटी हो घर में और कोई रिश्ता हो
इक नए एहसास की सूलि पे चड़ जाती है माँ

हर इबादत हर मोहब्बत में नहीं है इक ग़र्ज
बे-ग़र्ज़, बे-लूस, हर खिदमत को कर जाति है माँ

बाज़ूओं में खींच के जाएगी जैसे कायनात
अपने बच्चे के लिये बाहों को फैलाती है मां

ज़िन्दगी के सफ़र में गर्दिशों की धूप में
जब कोई साया नहीं मिलता तो याद आती है मां

प्यार कहते हैं किसे और ममता क्या चीज़ है
कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है मां

सफ़ा--हस्ती पे लिखती है ऊसूल--ज़िन्दगी
इस लिये एक मुक्ताब--इस्लाम कहलाती है मां

उस नई दुनिया को दिये मासूम रहबर इसी लिये
अज़्मतों में सानी--कुरान कहलाती है मां

घर से जब परदेस जाता है कोई नूर--नज़र
हाथ में कुरान ले कर दर पे जाती है मां

दे कर बच्चे को ज़मानत में रज़ा--पाक की
पीछे पीछे सर झुकाए दूर तक जाती है मां

कांपती आवाज़ से कहती है "बेटा अलविदा"
सामने जब तक रहे हाथों को लहराती है मां

जब परेशानी में घिर जाते हैं हम परदेस में
आंसुओं को पोछने ख्वाबों में जाती है मां

देर हो जाती है घर आने में अक्सर जब हमें
रेत पर मचले हो जैसे ऐसे घबराती है मां

मरते दम तक सका बच्चा ना घर परदेस से
अपनी दोनों पुतलीयां चौखट पे रख जाती है मां

बाद मर जाने के फिर बेटे कि खिदमत के लिये
भेस बेटी का बदल कर जाती है मां