Friday 7 December 2012

गांधीकथा ..एक सच्चाई जो सिर्फ़ गांधीकथा में ही मिलेगी।




     लगातार 3 दिन  वडोदरा कि मध्यस्थ जेल में गांधीजी के खास दोस्त श्री महादेवजी देसाई के पुत्र श्री नारायण देसाई की ,'गांधी कथा" चल रही थी । गांधीजी जिन्हें बचपन में 'बाबला' कहकर बुलाते थे। आज जिनकी आयु 86 होने पर भी वो इतनी गहराई से 'गांधीकथा' सुनाते हैं कि सुननेवाला तल्लीन/मग्न होकर उन्हें सुनता है और अपने सामने स्वयं गांधी को ही जैसे पा लेता है। उनकी सादगी आंखों को भाती है। मैं देख रही थी कि 'गांधी कथा' सुननेवाला हर शख़्स उतना मशगुल हो जाता कि वक़्त का पता ही नहिं चलता...कि चार घंटे कैसे बित जाते थे!!!इनमें चाहे जेलर हो पूलीसकर्मी हो या फ़िर 'बंदिवान" हों।

   
 आज़ादी और बलिदानों के बारे में बहोत कुछ मिल जायेगा । पर श्री नारायणभाई देसाई  ने 'महात्मा' के जीवन के इतने बारिक बारिक पन्ने हम सब के सामने रख दिये, जो कभी ना किताबों में पढे थे ना सुने थे। बचपन से गांधीजी की गोद में खेले नारायण देसाई जी ने गांधी को 'मोहन' को "महात्मा" बनते देखा है। बात देश के विभाजन की हो या जलियांवाला बाग़ हत्याकांड  'बाबला'  ने गांधीजी को तूटते हुए देखा है। 'महादेव् देसाई' जिन्हों ने अहिंसक आंदोलन का पहला बलिदान दिया। पूना के पास आग़ाखान महल में 15 अगस्त 1942 को उनका निधन हो गया तब गांधीजी बहोत तूट गये थे। वे बारबार महादेव का कंधा हिलाकर कहते थे कि' उठो महादेव उठो, अपनी आंखें खोलो। उन्हें था कि एक बार महादेव उनसे नज़र मिला लेते तो यूं न चल् देते। गांधीजी ने अपने हाथों से 'महादेव देसाई' के निर्जीव शरीर को नहलाया और स्वयं अपने हाथों से अग्निसंस्कार किया। उस वक़्त भी अंग्रेतो  महादेव देसाई कि कस्तुरबा से बिछुडना और आग़ाखान महल जेल में 22 फरवरी 1944 कस्तुरबा की मृत्यु हुई। मरने से पहले कस्तुरबा ने गांधीजी से कहा था कि 'महादेव ' तो गया, अब मैं भी इसी जेल में मरनेवाली हुं। महादेव को गांधी-कस्तुरबा अपना बेटा ही मानते थे। मरने से पांच मिनिट पहले ही कस्तुरबा ने गांधीजी को पुकारा और उनकी गोद में ही अपने प्राण छोडे। 8 मई 1944 को 22 महिने आग़ाखान जेल में बिताने के बाद जब गांधीजी को रिहा किया गया तब सबसे पहले वे कस्तुरबा और महादेव की समाधि पर गये।नोआख़ली का सफ़ाई काम के माध्यम से हिंदु-मुस्लिम को जोडने के प्रयास के साक्षी हैं नारायण देसाई जी।जिसने ना कभी सत्ता का लालच किया ना संपत्ति का! उस बापू के संस्कारों का सिंचन बोल रहा था जैसे "गांधी कथा' के मंच से...
  अभी बहोत कुछ लिखना है, कहना है, जो हमने "गांधीकथा" में सुना। 'बापू की परछाई बने बापू के परममित्र, सखा,पुत्र,पी.ए कुछ भी कहदो ऐसे महादेव देसाई के 'पुत्र' नारायण देसाई  को......मैं अपने आप को नसीबदार कहुंगी कि मैंने उन्हें रुबरु सुना।
मेरे साथ साथ .'कारागार' का सारा वातावरण शुद्ध, सौम्य,शालिनता से सून रहा था इन महान कथाकार की वाणी को.....और मैंने एक रचना लिखदी.....






एक गांधी चल पड़ा है फ़िर उसी विश्वास में... 

जो पला पोषा हुआ है बापू के सहवास में.... एक गांधी.
जिसने जीवन मे उतारा बापू के आदर्श को,
दे रहा ‘गांधी कथा’ सारे य भारत वर्ष को.
गांधीका जीवन दिखाने की सुनहरी आसमें.....एक गांधी....
मान से सम्मान से और सत्य के आहवान से,
दे रहा शिक्षा हमें ‘गांधीकथा’के ज्ञान से,
ले चला भारत को एक अंधकार से वो प्रकाश में....एक गांधी...
बापू से सिखा है जिसने ज़िन्दगी के अर्थ को,
सादगी से जो जीया है, जिसने जाना फ़र्ज़ को,
वो जीया है आज देखो कर्म ले के श्वास में.....एक गांधी
 —

आज बहोत दिनों बाद इस मंच पर आने को प्रोत्साहित करने के लिये http://shabdswarrang.blogspot.in/के राजेन्द्र स्वर्णकार की आभारी हुं।

3 comments:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...


आदरणीया रज़िया "राज़" जी
सादर प्रणाम !

आपने मेरे आग्रह का मान रखते हुए ब्लॉग पर नई पोस्ट लगाई , तदर्थ आभार !


"गांधीकथा ..एक सच्चाई जो सिर्फ़ गांधीकथा में ही मिलेगी।"
आलेख से बहुत कुछ जानने को मिला

बहुत सौम्य सुंदर गीत है ...
एक गांधी चल पड़ा है फ़िर उसी विश्वास में...

जो पला पोषा हुआ है बापू के सहवास में.... एक गांधी.
जिसने जीवन मे उतारा बापू के आदर्श को,
दे रहा ‘गांधी कथा’ सारे य भारत वर्ष को.
गांधीका जीवन दिखाने की सुनहरी आसमें.....एक गांधी.


नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाओं सहित…
राजेन्द्र स्वर्णकार

हां ,
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dilip said...

रझियाजी, आपकी यह पोष्ट बहुत ही प्रेरेअक रही..ऐस~ई हई जैसे पुरा माहोल और गांधीजी यही कही है..ये महसूस करा दिया..भाग्यकी बात है कि नारायणभाई जैसे..आज भी है..आपकी कविता भी लाजवाब है हंमेशा कए लिये प्रेरक है..वैसी लीखी है.यह प्रसंग जैल में हुआ य्ह विशेष बात है

dilip said...

रझियाजी, आपकी यह पोष्ट बहुत ही प्रेरेअक रही..ऐस~ई हई जैसे पुरा माहोल और गांधीजी यही कही है..ये महसूस करा दिया..भाग्यकी बात है कि नारायणभाई जैसे..आज भी है..आपकी कविता भी लाजवाब है हंमेशा कए लिये प्रेरक है..वैसी लीखी है.यह प्रसंग जैल में हुआ य्ह विशेष बात है