Friday 10 October 2008

विविधता में एकता






एक ही इश्वर एक ही अल्लाह,
एक रंग का है हर ख़ून।
फ़िर निर्दोषों की लाशों पर चढ,
मंदिरों की घंटनाद या मस्जिदों की अज़ान से,
कैसे मिलेगा चैन तूम्हें, बिना किये समाधान से।
आशाएं बहोत सी ऊंची रखते है हम भारतवासी,
ना हम हिन्दु ना हम मुसलिम, हम सब तो है भारतवासी।
यही स्वप्न यही है आशा हमें भारत की संतान से।
अपने हिन्दुस्तान से.............
ये है मेरा, तेरा ये है ये उसका या इसका वो है।
हूंसा-तूसी, पक्षा-पक्षी, मारा-मारी, छीना-झपटी।
यही क्या उत्तर हर झग़डे का? पूछो उस नादान से।
या उसके ईमान से....................
भारत में हर तरहाँ की बोली, मिलझुल कर जब खेलें होली।
त्यौहारों की यहाँ बात निराली, चाहे इद हो चाहे दीवाली।
बीज अगर बोयेंगे मिलकर, सिंचेंगे यदि उसको जूडकर।
खिल उठेगी तब हरियाली, पूछो हर किसान से।
खेत और ख़लिहान से...........................
ऐसे भी हैं लोग यहाँ पर, जिन्हें न मिलता दाना-पानी।
जिनकी छत है खूला आसमाँ, जिनका बिस्तर है धरती माँ।
प्यास बुज़ाते आंसु से वो श्रम से भरते अपना पेट,
भला इन्हें क्या आशाएं फिर, पूछो इस इन्सान से।
या मेरा भारत महान से........................
हिन्दु-मुसलिम, सीख़-इसाइ, हम सब तो हैं भाइ-भाइ।
ना कोइ ऊँचा ना कोइ नीचा, सब की माता अपनी माइ।
छोडो ये मज़हब की लडाइ, वरना होगी जग हँसाइ।
मानवता का पाठ पढें हम गीता और क़ुर्रान से।
गर्व से अभिमान से...............................
प्रहरी से कहो सीमा पर शत्रु से न रहे अज्ञान।
चाहे वहां बाधाएं आयें, डटा रहे वहाँ सीना तान।
भले बलि हो तु उस पथ पर तू तो है भारत की शान।
वतन की इस मिट्टी को हरदम विजयी रखे सम्मान से।
कहदो हर जवान से....................................
मैं भारत की, भारत मेरा, मज़हब कहो या धर्म ये मेरा।
हिंदुस्तानी मेरा भाइ, हर माँ मेरी मात समान।
यही मिट्टी मेरी आत्मा, यही है धरती मेरी जान।
परख़ो चाहे नापो मुज़को, वफ़ा के हर इम्तेहान से।
या मेरे बलिदान से.................................
चलो मिटाएं भेद धरम के, चलो बनाएं सुंदर भारत।
टुकडे ना हो देश हमारा, बनें एक दूजे का सहारा।
स्वार्थ की खातिर छोडें भेद, सब मिलकर बने हम एक।
करदें भारत की जयकार बुलंद एक आह्ववान से।
भारत माँ के गान से................................

26 comments:

श्यामल सुमन said...

रजिया जी,

मैं भारत की, भारत मेरा, मज़हब कहो या धर्म ये मेरा।
अच्छी कोशिश बात कहने की।

लेकिन मुझे लगता है कि रचना कुछ बडी हो गयी है साथ ही एक ही भाव को कई बार कहा गया है। इसके अतिरिक्त यह रचना छंदबद्ध है या छंदमुक्त, समझ नहीं पाया। वर्तनी पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इन छोटी छोटी बातों का ध्यान रखने से रचनाएँ सुन्दर होती चली जाती है, ऐसा मैं मानता हूँ। मुझे जो लगा लिख दिया। उम्मीद है अन्यथा नहीं लेंगी। आप में बहुत संभावना है, इसलिए खासकर ऐसा लिखा। लिखते रहें। शुभकामना।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

shama said...

Bohot achhe khayalat hain aapke!
Mubarak ho...!
Apnee ek kavitaka hissa pash kar rahee hun, ummeed hai pasand karengee...
............
............
Sir haazir hai,
Gar khanjar uthe
Kabhee watanpe mere
Aanch na aane paye!
Hamari artheebhi jab uthe,
Kehnewale ye na kahen,
Dekho ye Hindu bida
le raha hai,
Na kahen musalmaa,
Jaa raha hai,
Ekhee aawaaz ho,
Ekhee aawaazme kahen,
Ek insaan jaa raha hai!
Koyee Geeta padhe na padhe,
Farq nahee fatehabhi na padhe,
Par Vandmataramkee aawaaz,
Istarah buland ho
Ke murdaabhee sun sake!
Koyee rahe na rahe,
Par ye geet amar rahe,
Meree duaa qubool ho,
Meree saans rahe na rahe!

Amit K. Sagar said...

बहुत खूबसूरत. लिखते रहिये.

शोभा said...

ब्लाग जगत में आपका स्वागत है।

मेराज अहमद said...

आप की रचना शक्ति कमाल की है।कव्ता के ज़रिये आप ने बड़ी, लेकिन शज रूप में अपनी बत कही।

main chup nahi rahonga said...

sahi hai aapki baat .lekin kuch log yah mante hi nahi hai.

Yusuf Kirmani said...

आपकी कविता अच्छी लगी।

talib said...

umda nazm.
aur bhi khyaalaat achche hain.

kabhi moqa mile to deen-dunya

ki taraf bhi aaye.

allah hafiz

aaj ki Aawaaz said...

"सुन लेना फरियाद किसी, की होती है इमदाद बड़ी
आंसू को जो कन्धा दे दे, चारों तीर्थ नहाता है" !!!

ब्लाग्स की दुनिया में आपका स्वागत है !
बहुत सुंदर बात कही है आपने अपनी कविता में !
दिल को छूती हैं पंक्तियाँ !
मेरी हार्दिक शुभकामनाएं !
लिखते रहियगा ........ अगली पोस्ट का इन्तजार रहेगा !
टाइम मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी आईये !
aajkiaawaaz.blogspot.com

aaj ki Aawaaz said...

"सुन लेना फरियाद किसी की,होती है इमदाद बड़ी
आंसू को जो कन्धा दे दे,चारों तीर्थ नहाता है" !!

ब्लाग्स की दुनिया में आपका स्वागत है !
बहुत सुंदर बात कही है आपने अपनी कविता में !
दिल को छूती हैं पंक्तियाँ !
मेरी हार्दिक शुभकामनाएं !
लिखते रहियगा ........ अगली पोस्ट का इन्तजार रहेगा !
टाइम मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी आईये !
aajkiaawaaz.blogspot.com

प्रदीप मानोरिया said...

आपका चिट्ठा जगत में स्वागत है सुंदर कविता स्पष्ट भाव सार्थक . बधाई स्वीकारें
समय निकाल कर मेरे ब्लॉग पर भी पधारे और
पढ़ें उद्धव ठाकरे के बयां मुंबई मेरे बाप की पर एक रचना

DHAROHAR said...

Achi kavita,magar blog par thodi sanchipt ho to behtar hoga. Swagat mere blog par bhi.

Suitur said...

"मैं भारत की, भारत मेरा, मज़हब कहो या धर्म ये मेरा।......" बहुत खूबसूरत लिखा है। लिखते रहिये। शुभकामनाएं !

shan said...

good blog plz read
waqthai.blogspot.com

dr. ashok priyaranjan said...

देश के मौजूदा हालात को किवता में बहुत यथाथॆपरक ढंग से दशाॆया गया है । किवता कई सवाल भी खडे करती है । पंिक्तयां मन को झकझोर देती हैं ।देश के मौजूदा हालात को किवता में बहुत यथाथॆपरक ढंग से दशाॆया गया है । किवता कई सवाल भी खडे करती है । यह पंिक्तयां मन को झकझोर देती हैं । मैने भी अपने ब्लाग पर एक किवता िलखी है । समय हो तो पढें और प्रितिकर्या भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

deepak said...

hi razia i read ur blog i like it very much pls keep it up.......

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत खूब कहा है आपने। मुबारकबाद कुबूल फरमाएं।

ilesh said...

मैं भारत की, भारत मेरा, मज़हब कहो या धर्म ये मेरा।
हिंदुस्तानी मेरा भाइ, हर माँ मेरी मात समान।
यही मिट्टी मेरी आत्मा, यही है धरती मेरी जान।
परख़ो चाहे नापो मुज़को, वफ़ा के हर इम्तेहान से।
या मेरे बलिदान से.................................
चलो मिटाएं भेद धरम के, चलो बनाएं सुंदर भारत।
टुकडे ना हो देश हमारा, बनें एक दूजे का सहारा।
स्वार्थ की खातिर छोडें भेद, सब मिलकर बने हम एक।
करदें भारत की जयकार बुलंद एक आह्ववान से।
भारत माँ के गान से................................

फक्र से सर उँचा हो गया आपकी इस कविता को पढ़कर.....बहुत बधाई रज़िया जी

रौशन said...

ये गैप कुछ जियादा ही बड़ा नही हो गया है?

Anonymous said...

ati sundar wichaar

maanavtaa me khaanch to khud insaan hi karta raha hai,jaraa sochiye insaaniyat me bhed to khud ishwar bhi nahi kartaa,
1.jara sochiye kya goron aur kaalon kaa nikaah nahi hotaa?yadi upar waale ko ye manzoor na hotaa to kyaa wo unki godein sooni na rakhtaa?ishwar ko koi aapatti nahi hoti par ek do dhaarmik granth padh kar khud ko hi ishwar samajhne ki himaakat kar baithe kuch insaan karne lagte hain farmaan jaari.
2.maine apne ek dost ,jo ki mere se bhinn dharmpanthi hai ,ko apna khoon diyaa .a,b,o group aur ,rh factor ko chor mujhse aur kooch nahi poochaa gaya.yah soch kar ki uski ragon me meraa bhi khoon daur raha hai garv ke mere aankh chalak aate hain!
3.*dhaarmik granthon ko kon likhtaa hai --insaan,*kyun?--maanav ko naitiktaa kaa paath padhaane ke liye.,*par aaj tak hotaa kya aaya hai?---dharm kaa raajnaitik istemaal wistaarwaadi neetiyon ke liye jo aaj tak insaaniyat ko atom bomb se bhi jyaadaa nuksaan pahuchaa chukaa hai.

Anonymous said...

ati sundar wichaar

maanavtaa me khaanch to khud insaan hi karta raha hai,jaraa sochiye insaaniyat me bhed to khud ishwar bhi nahi kartaa,
1.jara sochiye kya goron aur kaalon kaa nikaah nahi hotaa?yadi upar waale ko ye manzoor na hotaa to kyaa wo unki godein sooni na rakhtaa?ishwar ko koi aapatti nahi hoti par ek do dhaarmik granth padh kar khud ko hi ishwar samajhne ki himaakat kar baithe kuch insaan karne lagte hain farmaan jaari.
2.maine apne ek dost ,jo ki mere se bhinn dharmpanthi hai ,ko apna khoon diyaa .a,b,o group aur ,rh factor ko chor mujhse aur kooch nahi poochaa gaya.yah soch kar ki uski ragon me meraa bhi khoon daur raha hai garv ke mere aankh chalak aate hain!
3.*dhaarmik granthon ko kon likhtaa hai --insaan,*kyun?--maanav ko naitiktaa kaa paath padhaane ke liye.,*par aaj tak hotaa kya aaya hai?---dharm kaa raajnaitik istemaal wistaarwaadi neetiyon ke liye jo aaj tak insaaniyat ko atom bomb se bhi jyaadaa nuksaan pahuchaa chukaa hai.

Vijay Kumar Sappatti said...

razia ji ,

pahli baar aapke blog par aaya hoon.. bahut acha laga aur aapki rachnaaye bhi padhi , maashaallah bahut kamaal likhti hai .. meri daad kabul karen..

main bhi kuch nazme likh leta hoon.. pls visit : www.poemsofvijay.blogspot.com

regards

अल्पना वर्मा said...

bahut hi achchee kavita likhi hai Razia ji .
yah purani post hai aap ki ...umeed hai aap niymit likhengi aur apni lekhni se aise hi rubru karwati rahengi.

डॉ .अनुराग said...

Aameen.....bas yahi lafz hai mere pas aapki dua ke liye.

Science Bloggers Association said...

खूबसूरत एवं प्रेरक गीत।

-----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

kshetrapal Sharma said...

Raz, I Thank you. I have read almost all your poes , they are good. You deserve congrats. I would like to make distinct the usage of J and Jh, wherever they occur. God bless you ----KshetrapalSharma