Thursday 25 June 2009

हिमालय


हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से ।
कि देख़ो छुट ना जाये कंही दुश्मन निशानों से।
हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से ...
ये आज़ादी जो हमने पाइ है, मुश्किल से अय लोगो ।
नज़र रख़्खो कहीं ग़द्दार ना निकले मकानों से ।
हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से...
जिन्हों ने सिंचकर अपना लहु जो बीज बोये थे ।
फ़सल अब लहलहाई है कहो ये उन किसानों से ।
हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से...
बडी ज़ागीर है जो छिनकर लाये हैं मुश्किल से ।
कि फ़िरसे लुट ना जाये कोई अपने ख़ज़ानों से ।
हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से ...
ये है आज़ादी का दिन सब तिरंगे को सलामी दो।
बड़ा त्यौहार है ये भुल ना जाओ बहानों से।
हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से...
अहिंसा की लडत से है हमें बापू ने सिखलाया।
कदम ना डगमगायें चल पडॉ अपने ठिकानों से।
हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से...
निशाने चूक ना जायेंगे अय दुश्मन संभल जाना।
ये है वो इंनकलाबी तीर जो निकले कमानों से।
हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से...
वतन पे जान देना धर्म है सबसे बड़ा “रज़िया”
यही तो हमने सिख़ा है सभी वेदो-पुराणों से।
हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से...

3 comments:

महफूज़ अली said...

हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से...

Bahut achchi line hai..........

aur poori kavita dil ko chhoo gayi.......

प्रकाश गोविन्द said...

बडी ज़ागीर है जो छिनकर लाये हैं मुश्किल से ।
कि फ़िरसे लुट ना जाये कोई अपने ख़ज़ानों से ।
हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से ...

देश प्रेम का अलख जगाती कविता अच्छी लगी !
आपका जज्बा, आपकी भावनाएं दिल को छू गयीं !


कृपया इस पंक्ति को सही कर लें :
अहिंसा की लडत से है हमें बापू ने सिखलाया।

आज की आवाज

डा०आशुतोष शुक्ल said...

निशाने चूक ना जायेंगे अय दुश्मन संभल जाना।
ये है वो इंनकलाबी तीर जो निकले कमानों से।
बहुत सच्चाई है इन पंक्तियों में...