Wednesday 9 September 2009

..महेमान बनके वो!!!!


जाने कहाँ से आया था महेमान बन के वो।

रहने लगा था दिल में भी पहचान बनके वो।


वो आया जैसे मेरा मुकद्दर सँवर गया।

मेरा तो रंग रुप ही मानो निख़र गया।

करने लगा था राज भी सुलतान बन के वो।

वो जानता था उसकी दीवानी हुं बन गई।

उसके क़्दम से मानो सयानी सी बन गई।

ख़्वाबों में जैसे छाया था अरमान बनके वो।


हरवक़्त बातें करने की आदत सी पड गई।

उस के लिये तो सारे जहां से मैं लड गई।

एक दिन कहाँ चला गया अन्जान बनके वो।


कहते हैं राज़ प्यार, वफ़ा का है दुजा नाम।

ईस पे तो जान देते हैं आशिक वही तमाम।

उस रासते चला है जो परवान बन के वो।




9 comments:

Mithilesh dubey said...

बहुत सुन्दर रचना। बधाई

mehek said...

उसके क़्दम से मानो सयानी सी बन गई।

ख़्वाबों में जैसे छाया था अरमान बनके वो।
waah lajawab

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, बधाई

दिगम्बर नासवा said...

कहते हैं “राज़” प्यार, वफ़ा का है दुजा नाम
ईस पे तो जान देते हैं आशिक वही तमाम .......

Vaah ....... Lajawaab khyaal hai.... pyaar vafaa ka doosra naam hi hai ... pyaar tabhi tak pyaar hai jab tak usme wafa hai ...... khoobsoorat likha hai ..

ओम आर्य said...

कहते हैं “राज़” प्यार, वफ़ा का है दुजा नाम।

ईस पे तो जान देते हैं आशिक वही तमाम।

उस रासते चला है जो परवान बन के वो।

वाह अतिसुन्दर सीधे दिल मे उतर गयी .......और क्या कहूँ......नि:शब्द हूँ.

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

बहुत खूब रजिया जी बहुत ही बेहतरीन रचना है ह्रदय की अंतर ध्वनी को जिस तरह से आप ने शब्द दिए है अद्भुद है ,,, प्रेमानुभूति की जो कल्पना आपने की है और संवेदित करती हुई आप की रचना के प्रति मै नत मस्तक हूँ
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

Amit K Sagar said...

सुन्दर रचना.
दिल से जैसा निकला,
बस सामने रख दिया हो
ऐसी रचना.
साधुवाद. जारी रहें.


*-*-*
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ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत ही प्यारा गीत लिखा है आपने।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

PRINCE said...

ho sake ki aap ka vo khavabo sehjada bhi aapki rah dekh raha ho..par aap use avoid kar rahi ho..